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प्राचीन काल में भारत में मांसाहार नहीं होता था। महाभारतकाल तक भारत की व्यवस्था ऋषि मुनियों की सम्मति से वेद निर्दिष्ट नियमों से राजा की नियुक्ति होकर चली जिसमें मांसाहार सर्वथा वर्जित था। महाभारतकाल के बाद स्थिति में परिवर्तन आया। ऋषि तुल्य ज्ञानी मनुष्य होना समाप्त हो गये। ऋषि जैमिनी पर आकर ऋषि परम्परा समाप्त हो गई। उन दिनों अर्थात् मध्यकाल के तथाकथित ज्ञानियों ने शास्त्र ज्ञान से अपनी अनभिज्ञता, मांसाहार की प्रवृति अथवा किसी वेद-धर्मवेत्ता से चुनौती न मिलने के कारण अज्ञानवश वेदों के आधार पर…

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मांसाहार मनुष्य का भोजन नहीं

मांसाहार का सेवन करना हिंदू संस्कृति में वर्जित है क्योंकि यह मनुष्य का नहीं राक्षसी भोजन है। जो तरह-तरह के अमृत पूर्ण शाकाहारी उत्तम पदार्थों को छोड़ घृणित मांस आदि पदार्थों को खाते हैं ऐसे मनुष्य राक्षस के समान होते हैं। धार्मिक ग्रंथों में जीव हत्या को पाप बताया गया है इसलिए बहुत से लोग शाकाहार का अनुसरण करते हैं।…

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ओशो की निगाह में शाकाहार

" आदमी को, स्वाभाविक रूप से, एक शाकाहारी होना चाहिए, क्योंकि पूरा शरीर शाकाहारी भोजन के लिए बना है। वैज्ञानिक इस तथ्य को मानते हैं कि मानव शरीर का संपूर्ण ढांचा दिखाता है कि आदमी गैर-शाकाहारी नहीं होना चाहिए। आदमी बंदरों से आया है। बंदर शाकाहारी हैं, पूर्ण शाकाहारी। अगर डार्विन सही है तो आदमी को शाकाहारी होना चाहिए। अब जांचने के तरीके हैं कि जानवरों की एक निश्चित प्रजाति शाकाहारी है या मांसाहारी: यह आंत पर निर्भर करता है, आंतों की लंबाई पर। मांसाहारी पशुओं के पास बहुत छोटी आंत होती है।…

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राजस्थान का बिश्नोई समाज

हम अपने आपको पर्यावरण के लिए समर्पित  होने का स्वांग रचते रहे. ख़ास  कर जब हम अपने मित्रों  के साथ  पिकनिक में जाया करते . वहां दूसरों द्वारा फैलाये हुए कचरे को इकठ्ठा कर उठा लाते. यह मेरी आदत नहीं थी, लगता है एक मजबूरी रही जिससे लोग मुझे पर्यावरण प्रेमी के रूप  में जानें. अपने आप को इस तरह पर्यावरण के लिए संवेदनशील होने का भ्रम पाल रखा है.

पर्यावरण के लिए सजग और प्रकृति से घनिष्ट राजस्थान के  बिश्नोई समाज के बारे में कुछ लिखने की चाहत एक अरसे से रही है परन्तु आज…

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गोवर्धन पूजा के मौके पर विशेष :  गौ-वत्स होने का फर्ज निभाइए

सभी गौभक्त गौप्रेमी बन्धुओ से मेरा निवेदन है की कृपया अपने गौ-वत्स होने का फर्ज निभाए...

मेरे मन में गाय के प्रति जो पूर्व स्थापित श्रद्धा थी वह श्रद्धा अब लौहवत अर्थात् लोहे के समान दृढ़ हो गई है।

संस्कार रूप में यह श्रद्धा भारतवासियों को प्राप्त हुई हैं।
इस संस्कार का मूल वाक्य है - ‘गाय हमारी माता है।’

श्रीकृष्ण जी के बाल्यकाल की एक संक्षिप्त घटना है।

एक दिन बालक कृष्ण अपनी माँ से बोले, ‘‘माता मैं गायों का नौकर बनकर सेवा करना चाहता हूँ और मैं गाय चराने के लिए उनके साथ जाऊँगा।’’

माँ ने इसे…

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