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Islam Aur Shakahar

पवित्र कुरान में एक भी ऐसा अध्याय (सूरा) नही है, जिसमें गाय अथवा बैल को मारने के संबंध में आदेश दिये गये हों। बल्कि ऐसे आदेश और ऐसा परामर्श अनेक स्थानों पर दिया गया है कि इनसानों को क्या खाना चाहिए। उनके खान पान में किन वस्तुओं का समावेश होना चाहिए। हमारी खाने पीने की आदतें किस प्रकार की होनी चाहिए, इसकी भी चर्चा की गयी है। अल्लाह ने आदम को आदेश देते हुए कहा, तुम और तुम्हारी पत्नी जब स्वर्ग में थे, उस समय हमने तुम्हें फल खाने के लिए दिये। और तुम अब जहां भी रहोगे वहां भी तुम्हें फल खाने के लिए देंगे। (2.35)

ओ मोहम्मद उन्हें यह शुभ समाचार दे दो कि जो मुझमें विश्वास करते हैं और अच्छे काम करते हैं, उनके लिए नीचे (धरती पर) भी बगीचे होंगे, जहां नदियां बह रही होंगी और हर समय वहां खाने के लिए फल होंगे, लेकिन उस वृक्ष के निकट न जाना नही तो गुनहगार बन जाओगे। (2.25)

अल्लाह, जिसने स्वर्ग और धरती बनाई है और जिनके लिए आकाश से पानी बरसाया है, वह सब इसके लिए कि तुम्हारे खाने हेतु फल प्राप्त हों। (14.32)

जिसने तुम्हारे रहने के लिए यह धरती बनाई है, और सिर पर आकाश रूपी छत तैयार की है तथा आकाश से पानी बरसाया है, इसलिए कि तुम्हारे खाने के लिए फल पैदा हो सकें। (2.22)

कुरान की उपर्युक्त चार आयतों से यह जानकारी प्राप्त होती है कि जब अल्लाह ने आदम और हव्वा ईव को बनाया तो उन्हें खाने के लिए फल दिये। जब वे पुन: स्वर्ग को लौटेंगे, उस समय भी उनके खाने के लिए स्वर्ग में फल दिये जाएंगे। इसलिए जब ईश्वर ने धरती बनाई तो फल मनुष्य जाति के खाने के लिए बनाए। उक्त बात हजरत मोहम्मद पैगंबर साहब के जीवन चरित्र से भी भी जानी जा सकती है। हम देख सकते हैं कि आपके प्रतिदिन के भोजन में रोटी, दूध और खजूर का समावेश होता था। कभी कभी वे भेड़ और ऊंट के मांस का भी सेवन करते थे, किंतु आपने बैल अथवा गाय के मांस का सेवन कभी नही किया।

पवित्र कुरान में केवल एक स्थान पर गाय के बलिदान के संबंध में एक कथा पढ़ने को मिलती है। जब मोजेज (मूसा) ने अपने लोगों से कहा कि अल्लाह का आदेश है कि तुम एक गाय का बलिदान करो। तब लोगों ने मूसा से पूछा कि आप हमसे मजाक तो नही कर रहे हो? मूसा ने कहा कि ईश्वर इस प्रकार का मजाक करने के लिए नही कहता। तब उन्होंने कहा कि आप हमारे लिए प्रार्थना कर यह स्पष्ट रूप से बताइए कि वह गाय किस प्रकार की हो?

मूसा ने उत्तर दिया-वह गाय न तो अधिक बूढ़ी हो और न ही जवान। वह बीच की आयु की हो। अब तुम वह करो, जिसका तुम्हें आदेश दिया गया है। उन्होंने कहा-आप ईश्वर से प्रार्थना करो कि वह हमें यह बताए कि उक्त गाय किस रंग की हो? मूसा ने उत्तर दिया कि वह पीले रंग की हो औ उसका रंग चमकदार हो। जिसे पाने वाला खुश हो जाए।

जिस कृत्य से अपने पड़ोसी का दिल दुखता हो और जिस वस्तु के खाने से अपने साथ रहने वाले के मन में खटास पैदा होती है, उसे इसलाम ने वर्जित किया है। इसलिए आम धारणा यही रही कि सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखने के लिए भारत गौ-वध पर प्रतिबंध अनिवार्य है। भिन्न भिन्न इसलामी विद्वानों ने अब तक 117 बार फतवे जारी करके गाय के न काटने के लिए मुसलिम बंधुओं से अपील की है। जमीअतुल ओलेमा के अध्यक्ष असद मदनी ने एनडीए सरकार के समय में उर्दू समाचार पत्रों में अपना बयान जारी करके मुसलमानों से आग्रह किया था कि वे बकरी ईद के दिन गाय की कुरबानी न करें।

एक सामान्य बात यह है कि जब अन्य हालात पशु भारत में उपलब्ध हैं तो फिर गाय अथवाा बैल का कुरबानी के लिए चयन करना उचित नही है। यदि हजरत इब्राहीम अपने पुत्र इस्माइल की कुरबानी का संकल्प करके ईश्वर को प्रसन्न कर सकते हैं तो यहां के अल्पसंख्यक मुसलिम बंधु भी गाय और बैल की रक्षा करके अपने देशवासियों का दिल जीत सकते हैं। कुरबानी नाम तो त्याग का है। क्या मुसलिम बंधु देश में शांति स्थापित करने के लिए इतना त्याग नही कर सकते? कोई यह कह सकता है कि सरकार यदि गौ-वध पर पाबंदी के लिए कड़े कानून नही बनाती है तो इसमें कुरबानी करने वाले का क्या दोष है? लेकिन क्या सारे काम कानून के भय से ही होने चाहिए? अपनी आत्मा की आवाज पर हम स्वयं किसी वस्तु के वध पर नैतिक दायित्व के रूप में प्रतिबंध क्यों नही लगा सकते? भारत में गाय और बैल का जो उपयोग होता है, उसे देखते हुए स्वयं मुसलिम ऐसा निर्णय लेंगे तो वह अधिक सुखद और स्थायी होगा।

मुसलमान अपने गौ-पालन के लिए मशहूर है। वह कई स्थानों पर गौशाला स्थापित करने में सहयोग देता है। सूफी संतों ने गायों को पाला है और गौभक्त होने का संदेश दिया है। नागपवुर में एक ऐसे ही मुसलिम संत और उनकी पत्नी गऊशाला चलाया करते थे। ताजुद्दीन बाबा प्रसिद्घ गौभक्त थे। अनेक उर्दू कवियों ने गाय के गुणगान करते हुए कविताएं लिखी है। हिंदी में रसखान इसके लिए मशहूर है तो उर्दू में मेरठ के स्व. कवि मोहम्मद इस्माइल साहब प्रख्यात हैं। उनकी सरल और मधुर कविता को याद करके उर्दू कक्षाओं के विद्यार्थी गौ माता का यशोगान करते हैं।

भारतीय उपखंड का मुसलमान हर मामले में सऊदी अरब को अपना आदर्श मानता है। क्या गाय के पालन के संबंध में भी वह ऐसा करना चाहेगा? यदि नही चाहता है तो फिर उसे यह स्वीकार करना पड़ेगा कि उसका मापदंड दोहरा है। वास्तव में देखा जाए तो सऊदी अरब को गाय के प्रति कोई प्रेम नही होना चाहिए, क्योंकि वह उसके देश का प्राणी नही है। भारत में गाय के प्रति एक विशेष प्रेम का कारण यह है कि गाय इस देश की माटी से जुड़ा हुआ प्राणी है। कृषि प्रधान देश में गाय का वही महत्व है जो अरबस्तान के लिए ऊंट का है। इसके बावजूद अरबी लोग गाय को कितना चाहते हैं और उसके लालन पालन से कितना लाभ उठा रहे हैं, यह भारतीय मुसलमानों को जानने की आवश्यकता है। अरबस्थान जैसे रेगिस्तानी देश में गाय के प्रति इतना ममत्व रखना एक आश्चर्य की बात है। इसलिए हम यहां सऊदी अरब के अल शफीअ फार्म नही बल्कि गऊ-सेवा का आंदोलन है। सऊदी अरब का अल शफीअ फार्म-

अरबस्तान के तेलिया राज हमेशा एक कथन दोहराते रहते हैं। मेरा बाप का बाप यानी परदादा ऊंट पर बैठा करता था। समय बदला तो दादा कार में घूमने लगा। पिता ने विमान को अपना लिया। मैं सुपर सॉनिक विमान में घूमतमा हूं। मेरा बेटा अपोलो जैसे किसी यान में बैठकर यात्रा करना पसंद करेगा। लेकिन उसका बेटा फिर से ऊंट पर बैठ जाएगा। दुनिया के चक्र में सब चीजें समाप्त हो जाती हैँ लेकिन कुदरत की पैदा की हुई चीज नष्ट नही होती। उसका महत्व भी समाप्त नही होता। जिस वस्तु को एक विशेष स्थान के लिए पैदा किया, वहां उसकी जरूरत हमेशा बनी रहती है। इसलिए ऊंट कल जितना अरबस्तान के लिए उपयोगी था उतना ही आने वाले समय में भी रहेगा।

सऊदी अरब के अल खिराज नामक नगर से प्राप्त एक रपट को देखिए जो मश्रेकुल वस्ता नाम के दैनिक ने प्रकाशित की है। सऊदी अरब के अल खिराज नामक स्थान पर जब सूर्य उदय होता है तो हजारों गायें एक विशाल शेड की छाया तले आकर शरण लेती है। यहां कंप्यूटर के द्वारा बढ़ते तापक्रम पर नजर रखी जाती है। उसके अनुसार गायों पर पानीकी बौछारें बरसाई जाती हैं।

शेड में स्वचलित परदे लगाए गये हैं। जिधर धूप होती है, परदे उसी दिशा में तन जाते हैं। धूप के न आने से इन गायों को बड़ी राहत मिलती है। इस शेड के बाहर औसतन 46 डिग्री सेल्सियस गरमी होती है। 800 मीटर लंबे शेड में दर्जनों डेजर्ट कूलर लगे हुए हैं। उक्त फार्म सऊदी अरब की राजधानी रियाद से 100 किलोमीटर दूर दक्षिण पूर्व में स्थित है। इस फार्म को अल शफीअ नाम दिया गया है, जिसका साधारण भाषा में अर्थ होता है-मेहरबान, यानी कृपालु। गाय के गुण के अनुसार ही उसका नाम है। वास्तव में यह पशु मानव जाति के लिए कृपावंत है। गाय की सेवा के लिए यहां रात दिन लगभग 1400 आदमी काम करते हैं।

अल शफीअ फार्म अरबस्तान की शुष्क और बंजर जमीन पर बीस साल पूर्व स्थापित किया गया था। रेगिस्तान में जो भी कठिनाईयां होती हैं, उनका सामना करते हुए यह फार्म तैयार किया गया, जो आज विश्व के अच्छे फार्मों में गिरा जाता है। इस फार्म के मैनेजर जेनुल मजरम का कहना है कि यह क्षेत्र अत्यंत गरम और शुष्क है, इसलिए पानी की उपलब्धता हमारे लिए सबसे बड़ी चुनौती है। हमने इस रेगिस्तान में छह कुएं बनवाए हैं। प्रत्येक कुआं औसतन 1850 मीटर की गहराई तक बोर किया गया है। जमीन से निकलने वाला पानी बहुत गरम होता है। इसे ठंडा और स्वच्छ करने के लिए अलग से संयंत्र लगाये गये हैं। एक गाय प्रतिदिन 120 लीटर पानी पीती है। पूरे फार्म में लगभग एक करोड़ लीटर पानी का उपयोग किया जाता है। मैनेजर जेनुल का कहना है कि पानी के मामले में हम आत्मनिर्भर हैं। हमें बाहर कहीं से पानी लाने की आवश्यकता नही पड़ती है। गायों के चारे के लिए इस फार्म के पास ही दो किलोमीटर का घास उगाने का एक फार्म तैयार किया गया है। मैनेजर जेनुल मजरम का कहना है कि सभी सुविधाओं के गायें गरमी से थक जाती हैं। लेकिन इस पशु में कुदरत ने गजब का धैर्य और संतोष दिया है। वह अपने आपको इस प्रकार के कठोर जलवायु का अभ्यस्त बना लेती है और और अपने मालिक की भरपूर सेवा करती है।

अल शफीअ फार्म में इस समय कुल 36 हजार गायें हैं। इनमें पांच हजार भारतीय नस्ल की हैं। भारतीय गायों का दूध सेवन करने वाला एक विशेष वर्ग है। रियाद स्थित शाही परिवार में 400 लीटर भारतीय गायों का दूध जाता है। शेष मात्रा ऊंट के दूध की होती है। अल शफीअ फार्म की गायों का रंग या तो सफेद होता है या फिर काला। फार्म में जो भी अधिकारी काम करते हैं, उन्हें या कोपेनहेगन अथवा न्यूजीलैंड की किसी डेयरी का पांच साल का अनुभव होना अनिवार्य है। रेगिस्तान में जहां ढेरें कठिनाइयां हैं, वहीं एक सकारात्मक पहलू यह है कि यहां गायों की बीमारियां यूरोप और अमेरिका की तुलना में कम फेेलती हैं। अल शफीअ फार्म ने लोगों के मन में यह विश्वास पैदा कर दिया है कि डेयरी का उद्योग भी एक लाभदायी उद्योग है। इस समय अल शफीअ फार्म की गायों से प्रतिवर्ष 16 करोड़ 50 लाख लीटर दूध निकाला जाता है। यहां दूध निकालने के लिए कमरे बने हुए हैं। हर कमरे में 120 गायों का दूध मशीनों से निकाला जाता है। एक गाय के दूध निकालने में दस मिनट का समय लगता है। हर गाय औसतन 45 लीटर दूध देती है। जो गाय दूध देना बंद कर देती है उसका अलग से विभाग है। उसे सलाटर हाउस में नही बेचा जाता है, बल्कि उसके मूत्र और गोबर का खाद के रूप में उपयोग होता है। मर जाने के बाद उसका चमड़ा निकाल लिया जाता है, लेकिन उसके मांस और अन्य अवयवों को फार्म में दफन कर दिया जाता है। मृत शरीर जल्दी से खाद बन जाए, इसके लिए कुछ रसायनों का उपयोग किया जाता है। उक्त खाद बाजार में मिलने वाले मांस की तुलना में बहुत महंगा होता है। गायों को नहलाने से लेकर चराने तक में फार्म के कर्मचारी इस तरह से तल्लीन हो जाते हैं जैसा कि भारत के गोपाल कभी इन गायों के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर देते थे।
अरबस्तान के लोग गाय का पालन करते हैं, लेकिन भारत में अधिकांश गायों के क्रय विक्रय से लगाकर उसे सलाटर हाउस तक में पहुंचाने का धंधा होता है। अरबों का गायों से कोई सांस्कृतिक अथवा भावुक संबंध नही है, लेकिन भारतीय मुसलमान इस दिशा में कभी विचार करता है? यहां तो वह उसका रखवाला बनकर जंगल में उसे चराता है, उसके दूध का व्यापार करता है, लेकिन जब वह दूध देना बंद कर देती है, उस समय उसे किसी कसाई के हाथों बेच दिया जाता है। मात्र इसके लिए मुसलिम ही दोषी नही हैं, वे भी जिम्मेदार हैं जो गाय को माता कहकर पुकारते हैं।(सौ : उगता भारत)

--मुजफ्फर हुसैन

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