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पाठकों को याद होगा कि मैंने देश में शाकाहारी भोजन न करने वालों का बचाव किया था। जैसा कि मैंने पहले कहा था, हमारे खाने के बारे में होने वाली चर्चा का संबंध इस बात से ज्यादा है कि हम कोई फसल कैसे उगाते हैं और कितना सेवन करते हैं। इसका संबंध भोजन (इस मामले में मांस) से नहीं है। किसानों के लिए पालतू पशु भी संपत्ति ही हैं। मेरा मानना है कि अगर हम उन पशुओं को मांस के लिए बेचने की उनकी क्षमता भी छीन लेंगे तो हम उनको और गरीब बनाएंगे। इससे उनकी अहम संपदा मूल्यहीन हो जाएगी। मैं भोजन निर्माण के बारे में चर्चा जारी रखना चाहती हूं लेकिन इस बार दूसरे पहलू पर बात के साथ।

मैंने यह भी कहा था कि शाकाहार पृथ्वी की सेहत के लिए अहम है क्योंकि मांस का उत्पादन सही ढंग से नहीं होता है और उसका सही ढंग से सेवन भी नहीं किया जाता है। हाल ही में स्टॉकहोम में भोजन की निरंतरता को लेकर आयोजित एक बैठक में मेरे सामने यह बात एकदम स्पष्टï हो गई कि पूरी दुनिया को शाकाहारी बनाना संभव नहीं है। इसके लिए शाकाहारी व्यंजनों को नए तरीके से तैयार करना होगा और उन्हें स्वादिष्टï बनाने के जतन करने होंगे। हमारे देश में सब्जियों को भी गंभीरता से नहीं लिया जाता। हम उन्हें स्वाद और रंगत के लिए पकाना जानते हैं। सबसे अहम बात यह है कि हमारी सब्जियां स्वादिष्टï होती हैं। उनमें खुशबू होती है लेकिन पश्चिमी देशों के सुपर बाजार में जाइए तो सब्जियां देखने में अच्छी लगेंगी लेकिन उनमें कोई स्वाद नहीं होता है।

मिशेलिन की रेटिंग प्राप्त शेफ मथाइस डैलग्रन ने स्टॉकहोम का पहला शाकाहारी रेस्तरां खोला है। उनका कहना है कि उनका काम अधिक कठिन है क्योंकि स्वीडन तथा आसपास के देशों में कोई शाकाहारी व्यंजन होता ही नहीं है। अभी महज दो दशक पहले तक इन देशों में सब्जियां उगाई तक नहीं जाती थीं। वहां मांस ही मुख्य भोजन है। ऐसे में भला एक देश कैसा बदलाव लाए कि शाकाहार वहां की खानपान की आदत में प्रमुख हो जाए तथा मांसाहार द्वितीयक।

मेरे लिए सबसे अहम सवाल स्वाद का है। सब्जियों में स्वाद कैसे आता है? क्या उन्हें उगाने के तरीके में यह रहस्य छिपा है? दुनिया अब सब्जियों के स्वाद से आगे बढ़कर उसके अन्य गुणों तक चली आई है। मसलन उनमें दाग-धब्बों का न होना और उनको लंबे समय तक ढोने में उनका खराब न होना आदि। टमाटर की बात करें तो इसके स्वाद और खुशबू का अनूठा रिश्ता है। परंतु बैरी एस्टाब्रूक अपनी किताब टोमैटोलैंड में बताते हैं कि औद्योगिक उत्पादन वाले टमाटर की खूबसूरती बहुत ज्यादा टिकाऊ नहीं है। फ्लोरिडा में व्यापक पैमाने पर उगाए जाने वाले और साल भर निर्यात किए जाने वाले टमाटर की खूबियां सिमट चुकी हैं। इस सब्जी की पूरी यात्रा पर नजर डालें तो पता चलता है कि दुकानों में हमारे लिए क्या रखा होता है।

टमाटर सोलांसे परिवार का सदस्य है। करीब 3,000 प्रजातियों वाले इस फल की जड़ें चीन और भारत के साथ मध्य और दक्षिणी अमेरिका में हैं। लेकिन औद्योगिक स्तर पर होने वाले उत्पादन के दौरान इसकी एक किस्म एस लीकोपर्सिकम का देसीकरण हो गया। इसे बाजार के लिए विकसित किया गया। हमें अपनी सब्जियों को एक तरह से फैक्टरी में तैयार करना पसंद है। वैज्ञानिकों ने लगातार प्रयास किए कि टमाटर स्वत: परागण करे। इससे गुणवत्ता सुनिश्चित होनी तय थी क्योंकि संकर नस्ल तैयार होने की आशंका समाप्त हो गई। स्व परागण का अर्थ है कि पौधे को परागण के लिए किसी अन्य पौधे की आवश्यकता न पड़े और वह स्वयं अपने प्रतिरूप बीज तैयार करे।

बाजार के दबाव का पहला असर इसके रंग-रूप और आकार पर नजर आया। इसके बाद बात आई कीटों को लेकर प्रतिरोधण क्षमता और जैविक दबाव झेलने की ताकि इसका अधिक से अधिक उत्पादन हो सके। तीसरी प्राथमिकता है यह सुनिश्चित करना कि सब्जियां ज्यादा से ज्यादा दिन तक खराब न हों और ढुलाई के दौरान उनका आकार न बदले। एस्टाब्रुक के मुताबिक कठोर टमाटर का स्वाद कमजोर पड़ता जाता है। ऐसा इसलिए क्योंकि उसे अम्लता देने वाली जेली में कोई ताकत नहीं बचती। उसकी त्वचा उसे ताकत और मिठास देती है लेकिन कोई अम्लता नहीं। फसल वैज्ञानिकों ने एक के बाद एक किस्मों पर प्रयोग करते हुए उनके पोषण से लेकर उनकी खुशबू तक सब गंवा दिया। अमेरिका में हुए सर्वेक्षण बताते हैं कि आज के टमाटरों की तुलना सन 1960 के दशक से की जाए तो इनमें 30 फीसदी कम विटामिन, 30 फीसदी कम थियामिन, 19 फीसदी कम नाइसिन और 62 फीसदी कम कैल्शियम होता है।

टमाटर की इस कहानी का सबसे दुखद पहलू यह है कि अब खुशबू डालने के लिए भी जेनेटिक प्रौद्योगिकी का सहारा लिया जाता है। यह पूरा मामला भिन्न प्रकार की किस्में उत्पादित करने का नहीं बल्कि टमाटर को एक तरह से निर्मित करने से है। हमें समझना होगा कि फसल जैसी उगे उसे वैसे ही खाना चाहिए। शाकाहार से तात्पर्य है कृषि की प्रकृति के बारे में चर्चा करना। किसान ऐसी फसल कैसे उगाएं जो न केवल स्वाद में बेहतर हो बल्कि उन्हें ऐसी रकम भी दिलाए जो इस विविधता का संरक्षण करने में मदद करे। भारत के लिए यह बात खास तौर पर महत्त्वपूर्ण है। हम अपने पौधों को बहुत हल्के में लेते हैं। हमारे यहां ऐसी विविधता है जिससे टमाटर तक खिल सकता है। लेकिन हमारी इच्छा यह नहीं है। इसके बजाय हमारी आकांक्षा तो यह है कि हम भी सुपर बाजार के तर्ज पर फैक्टरीनुमा सब्जियां उगाएं। बेहतर आकार-प्रकार देखना प्रीतिकर हो सकता है लेकिन असली संतुष्टिï स्वाद और पोषण ही दे सकते हैं।

-सुनीता नारायण

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