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अल्बर्ट आइंसटीन ने कहा था कि इस धरती पर जीवन बनाए रखनें में कोई भी चीज मनुष्य को उतना फायदा नहीं पहुचाएगी जितना कि शाकाहार का विकास। लेकिन आज दुनिया का अस्तित्व ही संकट में है और संकट का कारण है बिगड़ता पर्यावरण तथा ग्लोबल वार्मिंग। माना जा रहा है कि ग्रीन हाउस गैस ग्लोबल वार्मिंग की मुख्य कारक है और जानवर ग्रीनहाउस गैस का उर्त्सजन करते है। जब ग्लोबल वार्मिंग से दुनिया का अस्तित्व संकट में आ गया है तो इससे बचने के लिए जानवरों का खात्मा होना चाहिए लेकिन प्रकृति में जीवों की प्रत्येक प्रजाति का अस्तित्व बचा रहना आवश्यक होता है। क्योंकि जीवों की प्रत्येक प्रजाति पृथ्वी का पारिस्थितिकीय संतुलन बनाये रखने में महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करती हैं। प्रकृति में पशु-पक्षी महत्वपूर्ण कड़ी हैं। अत: इनके खात्में की कल्पना यानि दुनिया के ग्लोबल वार्मिंग से भी पहले खत्म होने के हालात।

 

वास्तव में पशु-पक्षी हमारे अस्तित्व के लिए अनिवार्य हैं और इनका आहार के रूप में भक्षण प्रकृति विरोधी है निश्चित तौर पर हर प्रकृति विरोधी बात पर्यावरण विरोधी होती है, जहॉ तक माँसाहार की बात है इसके लिए पशुओ की फार्मिंगं पर्यावरण विरोधी है।

आज पर्यावरण संरक्षण के मुद्दे पर सारी दुनिया एक राय है और हर आदमी पर्यावरण को सुरक्षित रखने में अपनी भागीदारी तय करना चाहता है ऐसे में शाकाहारी होना यानि पर्यावरणवादी होना माना जा सकता है। ऐसी स्थिति में अल्बर्ट आइंसटीन की सोच प्रासंगिक है। वास्तव में आहार के लिए जानवरों का पालन अपने आप में एक खर्चीला कार्य है इसमें जानवरों के पालन पोषण के साथ-साथ देखरेख एवं माँस का प्रसंस्करण करना एक लम्बी एवं जटिल एवं पर्यावरण को नुकसान पहुचाने वाली प्रक्रिया है। अनुमान के मुताबिक एक एकड़ जमीन पर जहॉ 8000 किग्रा हरा मटर,24000 किग्रा गाजर और 32000 किग्रा टमाटर पैदा किए जा सकतें है वहीं इतनी जमीन के जरिए मात्र 200किग्रा. मॉस पैदा किया जा सकता है। आज सारी दुनिया जल संकट का सामना कर रही है भारत जैसे तीसरी दुनिया के देशों में यह संकट गंभीर हो गया है जिससे प्रकृति और पर्यावरण दोनो खतरे में है,और मांस उत्पादन में अत्याधिक पानी का उपयोग होता है अनुमान है कि एक किग्रा अनाज उत्पादन में जहाँ 17 लीटर पानी प्रयुक्त होता है तथा एक किग्रा सब्जी उत्पादन में 45लीटर पानी खर्च होता है वहीं एक किग्रा मॉस उत्पादन में 180 लीटर पानी खर्च होता है यही नहीं मॉस के प्रसंस्करण में प्रति किग्रा 135 लीटर तक पानी खर्च होता है। अत: मांसाहार यानि पानी की भारी बर्बादी और जब पानी का संरक्षण पर्यावरण संरक्षण है तो शाकाहारी बनो। वास्तव में मांसाहार का पर्यावरण विरोधी स्वरूप इन बातों से स्पष्ट हो जाता है। जहॉ तक जानवर और ग्रीनहाउस गैस के अंर्तसंबंध की बात है तो वो जानवर ज्यादा ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जित करते है जो आहार में अनाज और दानों का उपयोग करते है स्पष्टत: मॉस के लिए प्रयुक्त होने वाले जानवरों को ही आहार में अनाज दिया जाता है ताकि वो जल्दी हष्ट पुष्ट हो सकें। अमेरिका में मक्का उत्पादन का अधिकांश हिस्सा सुअर खा जातें है क्योंकि उन्हें मॉस के लिए तैयार किए जाता हैं। पशुचारण को पर्यावरण् विरोधी प्रक्रिया के तौर पर प्रचारित किया जा रहा है कहा जाता है कि पशु अंकुरण के समय ही पौधों को नष्ट कर देतें हैं उनकी हरी पत्तियॉ चट कर जातें है जबकि कि पशुचारण वनीकरण को बढ़ावा देता है क्योंकि इनका मल मूत्र जंगल की बंजर भूमि को उर्वर बनाता है।

अच्छी बात है कि लोग मांसाहार के पर्यावरण विरोधी स्वरूप को समझ रहें है आज पर्यावरण संरक्षण के प्रति बढ़ती संवेदनशीलता का परिणाम है कि मांसाहारी पश्चिम बदल रहा है अब अमेरिका और यूरोप में शाकाहार की जड़े मजबूत हो रहीं है। ब्रिटेन में 1985 मे जहॉ कुल जनसंख्या 2.6 फीसदी हिस्सा शाकाहारी था जो 1995 में बढ़कर 4.5 का प्रतिशत हो गया और आज की स्थिति में वहाँ की 7फीसदी से ज्यादा आबादी शाकाहारी हो गई। पिछले वर्ष शाकाहार से पर्यावरण संरक्षण के प्रति जन चेतना ताइवान में नो मीट नो हीट के संदेश वाले अभियान के जरिए देखनें मिली इसमें लगभग दस लाख नागरिकों ने शाकाहार अपनाने की शपथ ली ,इस अभियान में ताइवान की संसद के अध्यक्ष और ताइपे तथा काओस्युंग के मेयर भी शामिल हैं।

वास्तव में पर्यावरण की सुरक्षा हमारे अस्तित्व के लिए जरूरी है। और शाकाहार इसकी एक महत्तवपूर्ण कड़ी है। अगर हम पर्यावरण संरक्षण की बात करतें है तो हमें शाकाहारी होना चाहिए।

डॉ. --सुनील शर्मा

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