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नीयत सही रहने से ही बरकत होती है। हर इंसान अपने-अपने तौर-तरीके से मालिक को याद करता है। हमें यह जन्म परमात्मा की प्राप्ति के लिए ही मिला है। ये विचार संत उमाकांत महाराज ने शुक्रवार को बाबा जयगुरुदेव आश्रम द्वारा मेला ग्राउंड में आयोजित सत्संग व नामदान कार्यक्रम में व्यक्त किए।

संत उमाकांत महाराज ने कहा कि मनुष्य में सच्चाई, ईमानदारी और सेवा का भाव खत्म हो गया है। यह सब मनुष्य के आहार से हो रहा है। मांसाहार के कारण मनुष्य तरह-तरह की बीमारियां, झगड़ा, झंझट और परेशानी झेल रहा है। जीवन को सुखमय बनाना है तो शाकाहार को अपनाओ। उन्होंने कहा कि गाय जीवनदायिनी है। गाय का सम्मान और उसकी रक्षा करना सबका परम कर्तव्य है। इस अवसर पर डॉ. हरिराम शाक्य, रामशरण पांडेय, महेश शंखवार, अरविंद सिंह, कमल शाक्य, महेश राठौर, मनीष शाक्य, शशिभान सिंह बैस, उदय राठौर सहित कई श्रद्घालु मौजूद थे।

इंसान मांसाहार के कारण अपने जीवन को स्वयं ही कष्टमयी बना रहा है। वह भूल जाता है कि हाथी और घोड़ा शक्ति के प्रतीक हैं, पर वो मांसाहारी नहीं हैं। जीवन में अन्न का विशेष महत्व होता है। जैसा आहार होता है, हमारा चित्त भी वैसा ही हो जाता है। इसलिए जीवन में शाकाहार को ही अपनाना श्रेष्ठ है।

मनुष्य का शरीर परमात्मा को पाने का जरिया है। नामदान (दीक्षा) इस शरीर के जरिए परमात्मा तक पहुंचने का सबसे सहज माध्यम है। परमात्मा को पाने के लिए अच्छे और सच्चे गुरु के सानिध्य में नामदान की महिमा को समझना बेहद जरूरी है। गुरु ही परमात्मातक पहुंचने का रास्ता दिखाते हैं। मनुष्य शरीर की सार्थकता परमात्मा प्राप्ति में ही है।

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