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dalai-lama

कालचक्र पूजा के छठे दिन बौद्ध धर्मगुरु दलाई लामा ने कालचक्र मैदान में उपासकों को प्रवचन देते हुए कहा कि मन व चित को एकाग्र करने के लिए शाकाहारी होना आवश्यक है. इससे मन व शरीर दोनों शांत रहते हैं.


उन्होंने स्वयं के बारे में बताया कि उन्होंने 1964 में ही मांस खाना छोड़ दिया था. कुछ दिनों तक ठीक नहीं लगा. लगभग दो वर्षों तक. बाद में बीमार भी पड़ गया, लेकिन शाकाहार को अपनाये रखा. ठीक इसी तरह मन व चित को प्रसन्न रखने के लिए सबसे पहले एकाग्र होना जरूरी है. इसके लिए साधना करनी पड़ेगी. लंबे समय तक प्रयास करना होगा. कुछ दिनों में यह संभव नहीं है.

धर्मगुरु ने श्रद्धालुओं को मानसिक शांति के लिए की जानेवाली साधना के कुछ तरीके भी बताये. इसमें श्वसन क्रिया को नियंत्रित करने के नुस्खे भी समझाये. दलाई लामा ने कहा कि मन व चित जब तक शांत नहीं हो पायेगा, क्लेश व क्रोध पर भी अधिकार नहीं हो पायेगा. इस कारण बोधिचित का अध्ययन करने से पहले मन को एकाग्रता की ओर ले जाना होगा. शून्यता को धारण करना होगा, तभी समाधि संभव है.

खुद के अंदर करुणा पैदा करें

दलाई लामा ने कहा कि खुद को प्रसन्न रखने के लिए स्वयं के अंदर करुणा पैदा करनी होगी व यह क्लेश व क्रोध को दूर करने के बाद ही संभव है.

उन्होंने कहा कि केवल अपने बारे में सोचने से कुछ भी प्राप्त नहीं कर सकेंगे. धर्मगुरु ने स्वयं को उदाहरण के रूप में पेश करते हुए कहा कि 40 वर्ष पहले ही उन्होंने बोधिसत्व को पहचानने की कोशिश की थी. शुरुआत में ऐसा लगा कि यह संभव नहीं है, पर निरंतर प्रयास व अभ्यास करने से कुछ समय बाद यह महसूस होने लगा कि उन्हें सफलता मिल रही है. अब भी इस प्रयास में जुटे हैं और आपके बीच प्रवचन कर कुछ देने का ही प्रयास कर रहे हैं.

उन्होंने कहा कि लोग दूसरों को कुछ देना चाहते हैं, पर यह भी सोचने लगते हैं कि दूसरों को दे देने से अपने पास कुछ भी नहीं बचेगा. यह स्वार्थ को दिखाता है और यही सभी दुखों का कारण है. उन्होंने कहा कि स्वार्थ की भावना से ऊपर उठ कर दूसरों के बारे में सोचने से ही आपका कल्याण संभव है.करीब तीन घंटे के प्रवचन में दलाई लामा ने परोपकार, एकाग्रता व समाधि के लिए शून्यता को प्राप्त करने के बारे में विस्तार से बताया.

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