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सारी दुनिया में भारत ही ऐसा एकमात्र देश है, जिसमें करोड़ों शाकाहारी लोग रहते हैं। ये शाकाहारी लोग मांस, मछली, अंडा वगैरह नहीं खाते। वे मांसाहार नहीं करने को अपने धर्म का हिस्सा मानते हैं लेकिन अमेरिकी और यूरोपीय लोगों के मांसाहार में कोई धार्मिक बाधा नहीं है। दुनिया के मुस्लिम और बौद्ध देशों में भी मांसाहार पर कोई धार्मिक पाबंदी नहीं है। लेकिन आजकल अनेक यूरोपीय देशों और अमेरिका में लोग मांसाहार छोड़ रहे हैं, क्योंकि इन देशों की वैज्ञानिक संस्थाएं यह सिद्ध कर रही हैं कि मांसाहार मनुष्यों के शरीर के लिए हानिकारक है। वह स्वास्थ्य तो खराब करता ही है, उससे आर्थिक नुकसान भी होता है और वह पर्यावरण को हानि भी पहुंचाता है।

अभी-अभी अमेरिका की राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी ने एक नया अध्ययन प्रस्तुत किया है। उसमें बताया गया है कि मांसाहार ही दुनिया के एक-चौथाई प्रदूषण का कारण है। मांसाहार के कारण लोगों की उम्र घट जाती है। उस अध्ययन के अनुसार यदि लोग मांसाहार छोड़ दें तो हर साल 51 लाख लोगों को मरने से बचाया जा सकता है। यदि लोग मांस खाना बंद कर दें तो खाने-पीने की चीज़ों से जो प्रदूषण होता है, वह 70 प्रतिशत कम हो सकता है।

कसाईखानों से जो बदबू और गंदगी फैलती है, वह फल और सब्जियों से फैलने वाली गंदगी से कई गुना ज्यादा होती है। यदि लोग मांसाहार छोड़ दें तो हर साल लगभग 50 हजार करोड़ रु. की बचत हो सकती है। इतना पैसा हर साल मांसाहार से पैदा होने वाली बीमारियों के कारण बर्बाद होता है। प्रदूषण से बचने वाली राशि 20 हजार करोड़ से भी ज्यादा है। इस तरह से कई आंकड़े इस अध्ययन-रपट में पेश किए गए हैं।

लेकिन मैं तो यह समझता हूं कि मनुष्य के दांत और आंत को देखें तो ये दोनों मांसाहारी प्राणियों से अलग हैं। जैसे मनुष्य शाकाहार और मांसाहार दोनों कर सकता है वैसे ही सिर्फ कुत्ते, बिल्ली, मछली और चूहे ही कर सकते हैं। ज्यादातर तो जो जानवर शाकाहारी होते हैं, वे मांसाहार नहीं करते और जो मांसाहारी होते हैं, वे शाकाहार नहीं करते। बकरी मांस नहीं खाती और शेर घास नहीं खाता। मांस मनुष्य का स्वाभाविक भोजन नहीं है। किसी भी धर्म में मांस खाना अनिवार्य नहीं है। ऐसा कहीं नहीं लिखा है कि जो मांस नहीं खाएगा, वह अच्छा हिंदू या अच्छा मुसलमान या अच्छा ईसाई या अच्छा सिख नहीं होगा। सभी धर्मों के मुखियाओं को चाहिए कि वे अपने अनुयायियों को जीव-हिंसा से मुक्त रखें।

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