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हमारे संत, महात्मा और योग गुरु सदियों से यही कहते रहे हैं कि अगर अपनी सेहत को बचाना है, तो मांसाहार त्यागकर सात्विक भोजन शुरू कर दो। पर शायद हर किसी के लिए शाकाहार को पूरी तरह अपनाना आसान भी नहीं है, इसलिए यह देश पूरी तरह शाकाहारी कभी नहीं हो सका। लेकिन इस बार मांसाहार का विरोध एक नए मोर्चे से हुआ है। पिछले दिनों जब ब्राजील की राजधानी रियो डी जनेरो में दुनिया भर के पर्यावरणवादी, संयुक्त राष्ट्र के अधिकारी और कई राष्ट्रों के प्रमुख ग्लोबल वार्मिग के खतरों पर चर्चा के लिए जमा हुए, तो वहां से एक मजबूत आवाज मांसाहार के खिलाफ उठी। वहां कहा गया कि अगर धरती को बचाना है, तो मांसाहार त्याग दो।

पर्यावरणवादियों का कहना है कि अगर खतरनाक ग्रीन हाउस गैसों को कम करना है, तो इसे छोड़ना ही होगा। कहा जाता है कि दुनिया में ग्रीन हाउस गैसों का जो उत्पादन हो रहा है, उसमें एक-तिहाई हिस्सेदारी मीट उत्पादन वाले पशु पालन उद्योग की ही है। रियो के सम्मेलन में इस बात को काफी जोर देकर कहा गया, लेकिन सम्मेलन खत्म होने के बाद अब पश्चिमी देशों में यह पूछा जा रहा है कि क्या यह संभव है? सर्वेक्षण हो रहे हैं, लोगों की राय ली जा रही है, लेख लिखे जा रहे हैं।

एक पत्रकार ने यह भी लिखा है कि सम्मेलन में मीट उद्योग का विरोध करने वाले लोग बाद में लंच में मीट के व्यंजन ही खा रहे थे। एक तर्क यह भी दिया जा रहा है कि अगर लोग मीट खाना बंद कर दें, तो रसोई का खर्च काफी हद तक कम हो सकता है। हालांकि, पिछले कुछ समय में दुनिया भर में मीट उद्योग ने काफी तेजी से तरक्की की है। अनुमान है कि आने वाले दिनों में इसकी रफ्तार और तेजी से बढ़ेगी। इस समय दुनिया भर में मीट के लिए तकरीबन 60 अरब पशु पाले जा रहे हैं। सन 2050 में इनकी संख्या दोगनी यानी 120 अरब हो जाएगी। जाहिर है कि इस तरह से तो धरती के पर्यावरण को बचाना लगातार मुश्किल होता जाएगा।

लेकिन फिलहाल सबसे ज्यादा मुश्किल है दुनिया भर की मीट खाने की आदतों को बदलना। एक भारत को छोड़ दें, तो दुनिया के ज्यादातर देशों की लगभग पूरी आबादी किसी न किसी रूप में मांसाहार करती ही है। भोजन अक्सर सदियों से बनी हमारी संस्कृति और सोच का हिस्सा होता है। इसे रातों रात बदलना मुश्किल होता है। हमारी थाली में दो चीजें महत्वपूर्ण होती हैं, एक तो उससे मिलने वाला पूर्ण पोषण, जो हमारे शरीर की सारी जरूरतों को पूरा करता है और दूसरा वह स्वाद, जिसकी आदत हमें बचपन से ही पड़ जाती है, जो जीवन भर हमारी इंद्रियों को संतुष्टि देता है। इन दोनों ही चीजों में बदलाव बहुत मुश्किल होता है।

पश्चिमी देशों में योग के साथ ही शाकाहार के प्रचार की बहुत-सी कोशिशें हुईं, लेकिन वह सफल नहीं हो सकीं। समस्या यह थी कि भारत के लोग परंपरा के कारण यह अच्छी तरह जानते हैं कि शाकाहारी थाली में प्रोटीन, वसा, काबरेहाइड्रेट, खनिज, विटामिंस आदि के किस अनुपात से संतुलित पोषण प्राप्त करना है, लेकिन पश्चिम में यह परंपरा न होने के कारण संतुलन गड़बड़ा जाता है। भारत के कुछ हिस्सों, खासकर पूवरेत्तर भारत में भी यही समस्या है। एक समस्या यह भी है कि दुनिया भर में मीट की खपत को अच्छे जीवन स्तर का सूचकांक माना जाने लगा है। धारणा यह है कि जो लोग मीट का जितना ज्यादा उपभोग करते हैं, वे उतने ही समृद्ध हैं। भारत में मीट की खपत बढ़ने का एक कारण यह भी है। जाहिर है कि मीट की खपत आसानी से कम नहीं होगी, लेकिन इसे लगातार कम तो करना ही होगा। धरती के और खुद अपने अस्तित्व को बचाने के लिए यह जरूरी है।

(दैनिक हिंदुस्तान में सम्पादकीय लेख, २४ जून २०१२)

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